Saturday, September 06, 2008
Monday, April 14, 2008
Monday, October 29, 2007
Saturday, May 27, 2006
Thursday, September 15, 2005
हम तो बांस हैं-जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे
आज हिंदी दिवस था .उसका उपहार हमें यह मिला कि पता चला कि किसी ने हमारी जमीन पर अपना तम्बू गाड़ लिया है. चिट्ठाचर्चा जिसे हमने बड़े मन से शुरु किया था उस पर किन बचकानी हरकतों या गफलतों के कारण ऐसा हुआ मैं इस विवरण में नहीं जाना चाहता.न उसकी जरूरत समझता हूं.खाली नाम उडा़ने से लिखना होता होता तो सारे उठाईगीर लेखक/ कवि होते. तम्बू जिसने भी गाडा़ हो लेकिन यह सच है कि किसी भी तम्बू के लिये बम्बू(बांस) की दरकार होती है.बम्बू तो बिना किसी तम्बू के गड़ सकता है लेकिन कोई भी तम्बू बिना बम्बू के नहीं खडा़ हो सकता.
इसी क्रम में याद आ रही है अपने शाहजहांपुर के साथी राजेश्वर दयाल पाठक की कविता जो हमारी बात कहती है:-
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे.
हम कोई आम नहीं
जो पूजा के काम आयेंगे
हम चंदन भी नहीं
जो सारे जग को महकायेंगे
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.
बांसुरी बन के,
सबका मन तो बहलायेंगे,
फिर भी बदनसीब कहलायेंगे.
जब भी कहीं मातम होगा,
हम ही बुलाये जायेंगे,
आखिरी मुकाम तक साथ देने के बाद
कोने में फेंक दिये जायेंगे.
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे ,उतना हरियायेंगे.
तो भइया, हमें जब लिखना होगा तो किसी खास ब्लागनाम के तंबू की दरकार नहीं होगी.हम तो बांस हैं,जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.
हिंदी दिवस के अवसर पर हमारे यहां कविसम्मेलन भी हुआ.तमाम कवियों ने कवितायें पढ़ीं.एक साथी जय नारायन सक्सेना ने जो कविता पढ़ी़ वो काफ़ी पसंद की गयी.कविता यहां जस की तस प्रस्तुत है:-
तन खा कर तनखा मिलती है,तनखा को तन खा जाता है,
तनखा जब कर में आती है,तन खा से मन अन खा जाता है.
तनखा के मिलने से पहले,अधिकार आरक्षित होते हैं,
कर्तव्य आहें भरता है,आश्वास्सन बाधित होते हैं .
तनखा के कर में आते ही,मांगों की पुकारें आती हैं,
मांग न हो पातीं पूरी,पुकारें तन खा जाती हैं .
तनखा वह श्रम की खेती है,सीमित बोऒ सीमित काटो,
इस मासिक फसल के कटते ही,प्रसाद सा सबको बांटो.
नववर्ष की पावन बेला पर,पत्नी ने की कुछ फरमाइस,
चलो पिया तुम हमें दिखा दो,फूलबाग में लगी नुमाइश.
जब से बजट हुआ है घोषित,कभी न की कोई फरमाइस,
कल शादी की वर्षगांठ है,करो पिया तुम पूरी ख्वाइस .
राजदूत से जाना होगा,मेघदूत में खाना होगा ,
प्रेमनगर का पान चबाकर,प्रेमदूत बन जाना होगा.
पेंग बढ़ाकर झूले होंगे, आसमान को छूते होंगे,
ऊंचा वाला झूला झूलेंगे,क्षण भर को दुखड़े भूलेंगे.
कुआं मौत का देखेंगे हम,उड़ता हुआ धुआं देखेंगे,
चारो ओर हों खेल तमाशे,बैठ खायेंगे चाट-बतासे.
पंजाबी एक सूट सिला दो,हाई हील का बूट दिला दो,
जयपुर वाला लंहगा ले दो,सस्ता नहीं कुछ मंहगा ले दो.
पप्पू की जिद पूरी कर दो,ले दो,दो पहिये की गाड़ी,
कब से आस लगाये हूं मैं,पिया दिला दो सिल्क की साड़ी.
कल शादी की वर्षगांठ पर,मुझको क्या दोगे उपहार,
या फिर मुझको बहला दोगे,डाल गले में बाहों का हार.
बन्द करो अपनी फरमाइस,ना जाना है हमें नुमाइस,
जितनी पूरी करते आओ,उतना बढ़ती जाती ख्वाइस.
नयावर्ष हैं वही मनाते,जिनका साल गया उन जैसा,
वर्षगांठ हैं वही मनाते ,जिनकी गांठ में होता पैसा.
अपनी तो है श्वेत कमाई,दो नंबरी मत बात करो तुम,
चादर से मत पैर निकालो,आडंबर की मत बात करो तुम.
लक्ष्मण रेखा सी बंधी हुई, है मेरी तनखा सीता .
मत आमंत्रण दो मंहगे रावण को,अपहृत हो जायेगी सीता.
प्यार भाव वाचक संज्ञा है,एहसासों की पावन गंगा है,
मत आंको इसे उपहारों से,दूषित होगी मनभावन गंगा है.
मेरे पास न सोना-चांदी,न है धन खान रतन ,
मैं तो केवल प्रेम पुजारी,अर्पित तुझ पर निर्मल मन.
कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,
बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.
अंतिम बात तुम्हें समझाता,ओ मेरे दिन की रानी ,
याद रखो तुम'जय'की बानी,उतना उतरो जितना पानी.
इसमें फूलबाग,मेघदूत,प्रेमनगर आदि कानपुर की जगहों मोहल्लों के नाम हैं.
यह पोस्ट खासतौर से भोलानाथ उपाध्याय के लिये बतौर इनाम लिखी जा रही है.
इसी क्रम में याद आ रही है अपने शाहजहांपुर के साथी राजेश्वर दयाल पाठक की कविता जो हमारी बात कहती है:-
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे.
हम कोई आम नहीं
जो पूजा के काम आयेंगे
हम चंदन भी नहीं
जो सारे जग को महकायेंगे
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.
बांसुरी बन के,
सबका मन तो बहलायेंगे,
फिर भी बदनसीब कहलायेंगे.
जब भी कहीं मातम होगा,
हम ही बुलाये जायेंगे,
आखिरी मुकाम तक साथ देने के बाद
कोने में फेंक दिये जायेंगे.
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे ,उतना हरियायेंगे.
तो भइया, हमें जब लिखना होगा तो किसी खास ब्लागनाम के तंबू की दरकार नहीं होगी.हम तो बांस हैं,जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.
हिंदी दिवस के अवसर पर हमारे यहां कविसम्मेलन भी हुआ.तमाम कवियों ने कवितायें पढ़ीं.एक साथी जय नारायन सक्सेना ने जो कविता पढ़ी़ वो काफ़ी पसंद की गयी.कविता यहां जस की तस प्रस्तुत है:-
तन खा कर तनखा मिलती है,तनखा को तन खा जाता है,
तनखा जब कर में आती है,तन खा से मन अन खा जाता है.
तनखा के मिलने से पहले,अधिकार आरक्षित होते हैं,
कर्तव्य आहें भरता है,आश्वास्सन बाधित होते हैं .
तनखा के कर में आते ही,मांगों की पुकारें आती हैं,
मांग न हो पातीं पूरी,पुकारें तन खा जाती हैं .
तनखा वह श्रम की खेती है,सीमित बोऒ सीमित काटो,
इस मासिक फसल के कटते ही,प्रसाद सा सबको बांटो.
नववर्ष की पावन बेला पर,पत्नी ने की कुछ फरमाइस,
चलो पिया तुम हमें दिखा दो,फूलबाग में लगी नुमाइश.
जब से बजट हुआ है घोषित,कभी न की कोई फरमाइस,
कल शादी की वर्षगांठ है,करो पिया तुम पूरी ख्वाइस .
राजदूत से जाना होगा,मेघदूत में खाना होगा ,
प्रेमनगर का पान चबाकर,प्रेमदूत बन जाना होगा.
पेंग बढ़ाकर झूले होंगे, आसमान को छूते होंगे,
ऊंचा वाला झूला झूलेंगे,क्षण भर को दुखड़े भूलेंगे.
कुआं मौत का देखेंगे हम,उड़ता हुआ धुआं देखेंगे,
चारो ओर हों खेल तमाशे,बैठ खायेंगे चाट-बतासे.
पंजाबी एक सूट सिला दो,हाई हील का बूट दिला दो,
जयपुर वाला लंहगा ले दो,सस्ता नहीं कुछ मंहगा ले दो.
पप्पू की जिद पूरी कर दो,ले दो,दो पहिये की गाड़ी,
कब से आस लगाये हूं मैं,पिया दिला दो सिल्क की साड़ी.
कल शादी की वर्षगांठ पर,मुझको क्या दोगे उपहार,
या फिर मुझको बहला दोगे,डाल गले में बाहों का हार.
बन्द करो अपनी फरमाइस,ना जाना है हमें नुमाइस,
जितनी पूरी करते आओ,उतना बढ़ती जाती ख्वाइस.
नयावर्ष हैं वही मनाते,जिनका साल गया उन जैसा,
वर्षगांठ हैं वही मनाते ,जिनकी गांठ में होता पैसा.
अपनी तो है श्वेत कमाई,दो नंबरी मत बात करो तुम,
चादर से मत पैर निकालो,आडंबर की मत बात करो तुम.
लक्ष्मण रेखा सी बंधी हुई, है मेरी तनखा सीता .
मत आमंत्रण दो मंहगे रावण को,अपहृत हो जायेगी सीता.
प्यार भाव वाचक संज्ञा है,एहसासों की पावन गंगा है,
मत आंको इसे उपहारों से,दूषित होगी मनभावन गंगा है.
मेरे पास न सोना-चांदी,न है धन खान रतन ,
मैं तो केवल प्रेम पुजारी,अर्पित तुझ पर निर्मल मन.
कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,
बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.
अंतिम बात तुम्हें समझाता,ओ मेरे दिन की रानी ,
याद रखो तुम'जय'की बानी,उतना उतरो जितना पानी.
इसमें फूलबाग,मेघदूत,प्रेमनगर आदि कानपुर की जगहों मोहल्लों के नाम हैं.
यह पोस्ट खासतौर से भोलानाथ उपाध्याय के लिये बतौर इनाम लिखी जा रही है.
Saturday, August 20, 2005
फुरसतिया:कुछ बेतरतीब यादें
आज बीस अगस्त है। आज के ही दिन एक साल पहले मैंने ब्लाग लिखना शुरु किया था। रवि रतलामी के अभिव्यक्ति में छपे लेख तथा देवाशीष के ब्लाग पर उपलब्ध की बोर्ड की सहायता से जो पहली पोस्ट मैंने लिखी थी वह एक मायने में 'हायकू' पोस्ट थी।आज भी इससे भी छोटी पोस्ट लिखने का हुनर सिवाय हिंदी के आदि चिट्ठाकार आलोक के अलावा किसी को नहीं पता।शुरुआती दिनों में देवाशीष ,अतुल तथा पंकज के चिट्ठे तथा आलोक के कमेंट काफी पढ़े। देबाशीष की ये पोस्ट देखी जाये:-
बहरहाल देखते-देखते कब हम इस ब्लाग मैदान में कूद गये पता ही चला। दस दिन बाद हमारे ठेलुहा महाराज भी आ गये मैदान में। कुछ इसी के आसपास ही
जीतेन्द्र ने भी अपनी दुकान खोली। हम लिखना तो शुरु कर दिये लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि लिखा क्या जाये(अभी भी हालात वैसे ही हैं)। उस समय तक स्वागत-सत्कार की ऐसी मिसाइलें नहीं दगती थीं दनादन। सो हम आपस में वाह-वाह करके मस्त थे।
फिर हमें हमारे दोस्त ने बताया कि 'काउंटर' कैसे लगता है। लगाया तो देखा कि हमारा 'ब्लाग' तो देश-विदेश में पढ़ा जा रहा है। हम तो बौरा गये अपने 'ग्लोबलाइजेशन' से।हम खुशफहमी के नशे में थे कि हमें झटका मिला एक टिप्पणी से। अश्ररग्राम पर देबाशीष ने हमारा स्वागत-सत्कार करते हुये आशा की कि हम भाषा की शालीनता का ख्याल रखेंगे। हमने अवस्थी को लिखा-देखो ये बालक क्या कह रहा है! बताओ ,मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये।अवस्थी ने कहा -छोड़ना तो बालक के साथ अन्याय होगा। न्याय की रक्षा की जानी चाहिये। तोहमने तथा अवस्थी ने अपने-अपने ब्लाग पर न्याय किया। लेख लिखा जिसमे मौज तथा खिंचाई थी। देबाशीष ने टिप्पणी लिखी तथा हम अफसोस के शिकार हुये।अगर किसी अपनी एक पोस्ट के लिखे जाने का अफसोस है मुझे तो वह यही पोस्ट है।
इसके बाद तो दनादन सारा जमा पड़ा माल बाहर आता गया।मूल रूप से मौज-मजे के अंदाज में लेखन चलता रहा। एक टिप्पणी में अतुल ने लिखा:-
इस बीच दनादन लोग लिख रहे थे तथा टिप्पणियां भी लिखीं जा रहीं थीं। उधर भारतीय ब्लाग मेला में हिंदी के पोस्ट के नामीनेशन शुरु हो गयेथे। किसी एक महीने में हिंदी की कुछ पोस्ट ज्यादा थीं तो अतुल कीउछलती मेल आयी-छा गई रे हिंदी छा गई। हालांकि यह खुशी कुछ दिन बाद ही गायब हो गई जब वहां लोगों ने हिंदी पोस्ट कोशामिल नहीं किया। अतुल ने अक्षरग्राम पर लेख लिखा-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? हालांकि लिखा अतुल ने था 'तुझे' लेकिन मुझेलग रहा था कि मिर्ची तो अतुल को लगी हैं। बहरहाल इसपर लेख लिखागया -अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है! तथा कालान्तर में चिट्ठाचर्चा
की शुरुआत की गई।
उधर अनुगूंज की शानदार शुरुआत हुई। कुछ बहुत बेहतरीन पोस्ट अनुगूंज के माध्यम से लिखींगईं। बाद में बुनो कहानी मेंभी तीन कहानियां भी लिखी गईं । कुछशिथिलता फिलहाल बुनो कहानी में चल रही है। शायद समय के साथ कुछ तेजी आये।
इस बीच हिंदी ब्लाग मंडल का आभामंडल तेजी से फैल रहा था। वागर्थ में बहुत उत्साहित करने वाला लेख छपा। अन्य जगह भी जिक्र आया।
रविरतलामी के बाद अतुल भी अभिव्यक्ति में अपने संस्मरण लिख कर मिठाई खिलाने लगे थे।कुछ दिन के सलाह-मशवरे के बाद हिंदी जगत की पहली ब्लागजीन 'निरंतर' शुरु हुई। शानदार पत्रिका के बावजूद पाठक बहुत कम तथा काम ज्यादा । फिलहाल पत्रिका निकालना दिन पर दिन मुश्किल लगता जा रहा है।इस बीच ब्लागनाद भी चालू हुआ तथा काफी हल्ला भी हुआ। जीतेन्द्र,अतुल तथा स्वामीजी में। वह भी मजेदार कहानी है।कहानियां तमाम हैं। सिलसिलेवार लिखना काफी मजेदार हो सकता है-हिंदी ब्लागजगत के यादगार विवाद।
जब हमने लिखना शुरु किया था तब ३० के लगभग ब्लाग थे ।अब आंकड़ा लगभग ९० तक आ गया है। जल्द ही मामला तीन अंकों तक पहुंचेगा।
साथी ब्लागर कुछ तो बहुत अच्छा लिखते हैं। मैंने कुछ लेख संकलित करने शुरु किये थे-'हाल आफ फेम टाईप'के।कामआधा ही हो पाया लिहाजा उसे अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा।पहले कमेंट काफी अनौपचारिक तथा बिंदास किस्म के करते थे लोग।अब कुछ सभ्यता की बीमारी लग गई है। इधर कमेंट करने में कंजूसी भी काफी होने लगी है। मुझे लगता है कि यादगार टिप्पणियों का संग्रह भी किया जाना चाहिये।
मैं १ अप्रैल से नियमित रूप से हिंदिनी पर लिखने लगा। यहां कभी-कभी लिखता हूं। हिंदिनी पर शुरुआत भी मजेदार रही। स्वामीजी ने मेरा दिसम्बर में लेख पढ़ा था । फिर वे हिंदी मे ब्लाग लिखने लगे। सनसनीखेज भाषा के मालिक स्वामी शुरु में बराबर यह अवसर उपलब्ध कराते रहे कि लोग समझें कि ये हिंदी सीख रहा है। बाद में कुछ हमपर ज्यादा ही फिदा हो गये ये। एक दिन फोन पर करीब तीन घंटे बातचीत हुई । फिर हम इनके कहने पर हिंदिनी में लिखने लगे। पर मेरा लगाव यहां से बराबर बना हुआ है। जब निर्जीव तथा तकनीकी रूप से कमतर चीजों से लगाव इतना हैतो सजीव लोगों से लगाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि जब मैंने हिंदिनी में लिखना शुरु किया तब जीतेन्द्र-अतुल-स्वामी का प्रेमालाप चरम पर था। जीतेन्द्र ने कभी मुझसे कहा होगा अपनी साइट में लिखने को। मुझे नहीं याद रहा होगा। पर इनको याद था। तो काफी दिन मुंह फुलाये रहे जीतू। कहते थे -तुम तो अजातशत्रु हो। लेकिन तुम भीष्मपितामह की तरह जिस तरफ नहीं जाना चाहिये वहां चले गये। हम भी मौज लेते रहे।
फिलहाल लिखना जारी है। नेट पर, जहां कि लोग कुछ पोस्ट लिखकर ब्लाग बंदकर देते हैं तथा कुछ अंक निकाल कर पत्रिकायें वहां मुझे लगता है कि मैं लिखता रहा साल भर ,काफी है।हां ,भी कभी मन करता है कि मैं भीरविरतलामीजी तथा सुनीलजी की तरह नियमित लिख पाता!
मेरे लेखों के बारे में लोग बतायेंगे। मैं लंबे लेख लिखने के लिये बदनाम रहा ।पर कुछ अपने कुछ लेख बार-बार पढ़ने का मन करता है। तमाम दूसरे लेख भी हैं जिन्हें देखकर कोफ्त भी होती है। कथाकार कृष्णबिहारीजी अक्सर हौसला बढ़ाते हुयेकहते हैं-तुमको तो मुख्यधारा में आकर लिखना चाहिये। पूर्णमा वर्मनजी कहती हैं कि मेरे एक लेख में दो-तीन लेखों की बात मिली होती है।थोड़ा मेहनत से और बेहतर लेख लिखा जा सकता हैं। नंदनजी कहते हैं -तुम लिखते रहो ।दिशा अपने आप तय होती जायेगी।
मैं हर लेख लिखने के बाद यही सोचता हूं कि ये वाला पोस्ट कर दो आगे देखा जायेगा।
आप क्या सोचते हैं?
याज़ाद ने अनिल के एक चिट्ठे के हवाले से हिन्दी ब्लॉग गीत की बात छेड़ी। तो अपन कहां पीछे रहने वाले थे। हाजिर है कुछ ब्लॉग गीतः
ये अपने बाप्पी दा इश्टाईल में:
ब्लॉगिंग बिना चैन कहां रेSSS
कॉमेन्टिंग बिना चैन कहां रेSSS
सोना नहीं चांदी नहीं, ब्लॉग तो मिला
अरे ब्लॉगिंग कर लेSSS
..ये कुछ अल्ताफ राजा की शैली:
तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
सुबह पहले मौके पे
नेट पे बैठ जाओगे।
तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
और ये जॉनी वॉकर का बयानः
जब सर पे ख्याल मंडराएं,
और बिल्कुल रहा ना जाए।
आजा प्यारे ब्लॉग के द्वारे,
काहे घबराए? काहे घबराए?
सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन
इस ब्लॉगिंग के बड़े बड़े गुन
हर बलॉगर बन गया है पंडित
गूगल भी थर्राए।
काहे घबराए? काहे घबराए?
बहरहाल देखते-देखते कब हम इस ब्लाग मैदान में कूद गये पता ही चला। दस दिन बाद हमारे ठेलुहा महाराज भी आ गये मैदान में। कुछ इसी के आसपास ही
जीतेन्द्र ने भी अपनी दुकान खोली। हम लिखना तो शुरु कर दिये लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि लिखा क्या जाये(अभी भी हालात वैसे ही हैं)। उस समय तक स्वागत-सत्कार की ऐसी मिसाइलें नहीं दगती थीं दनादन। सो हम आपस में वाह-वाह करके मस्त थे।
फिर हमें हमारे दोस्त ने बताया कि 'काउंटर' कैसे लगता है। लगाया तो देखा कि हमारा 'ब्लाग' तो देश-विदेश में पढ़ा जा रहा है। हम तो बौरा गये अपने 'ग्लोबलाइजेशन' से।हम खुशफहमी के नशे में थे कि हमें झटका मिला एक टिप्पणी से। अश्ररग्राम पर देबाशीष ने हमारा स्वागत-सत्कार करते हुये आशा की कि हम भाषा की शालीनता का ख्याल रखेंगे। हमने अवस्थी को लिखा-देखो ये बालक क्या कह रहा है! बताओ ,मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये।अवस्थी ने कहा -छोड़ना तो बालक के साथ अन्याय होगा। न्याय की रक्षा की जानी चाहिये। तोहमने तथा अवस्थी ने अपने-अपने ब्लाग पर न्याय किया। लेख लिखा जिसमे मौज तथा खिंचाई थी। देबाशीष ने टिप्पणी लिखी तथा हम अफसोस के शिकार हुये।अगर किसी अपनी एक पोस्ट के लिखे जाने का अफसोस है मुझे तो वह यही पोस्ट है।
इसके बाद तो दनादन सारा जमा पड़ा माल बाहर आता गया।मूल रूप से मौज-मजे के अंदाज में लेखन चलता रहा। एक टिप्पणी में अतुल ने लिखा:-
आपने और जीतेंद्र भाई ने हिंदी चिठ्ठा जगत के शांत तालाब में पत्थर मारकर जो हलचल मचायी तो मजा ही आ गया|
इस बीच दनादन लोग लिख रहे थे तथा टिप्पणियां भी लिखीं जा रहीं थीं। उधर भारतीय ब्लाग मेला में हिंदी के पोस्ट के नामीनेशन शुरु हो गयेथे। किसी एक महीने में हिंदी की कुछ पोस्ट ज्यादा थीं तो अतुल कीउछलती मेल आयी-छा गई रे हिंदी छा गई। हालांकि यह खुशी कुछ दिन बाद ही गायब हो गई जब वहां लोगों ने हिंदी पोस्ट कोशामिल नहीं किया। अतुल ने अक्षरग्राम पर लेख लिखा-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? हालांकि लिखा अतुल ने था 'तुझे' लेकिन मुझेलग रहा था कि मिर्ची तो अतुल को लगी हैं। बहरहाल इसपर लेख लिखागया -अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है! तथा कालान्तर में चिट्ठाचर्चा
की शुरुआत की गई।
उधर अनुगूंज की शानदार शुरुआत हुई। कुछ बहुत बेहतरीन पोस्ट अनुगूंज के माध्यम से लिखींगईं। बाद में बुनो कहानी मेंभी तीन कहानियां भी लिखी गईं । कुछशिथिलता फिलहाल बुनो कहानी में चल रही है। शायद समय के साथ कुछ तेजी आये।
इस बीच हिंदी ब्लाग मंडल का आभामंडल तेजी से फैल रहा था। वागर्थ में बहुत उत्साहित करने वाला लेख छपा। अन्य जगह भी जिक्र आया।
रविरतलामी के बाद अतुल भी अभिव्यक्ति में अपने संस्मरण लिख कर मिठाई खिलाने लगे थे।कुछ दिन के सलाह-मशवरे के बाद हिंदी जगत की पहली ब्लागजीन 'निरंतर' शुरु हुई। शानदार पत्रिका के बावजूद पाठक बहुत कम तथा काम ज्यादा । फिलहाल पत्रिका निकालना दिन पर दिन मुश्किल लगता जा रहा है।इस बीच ब्लागनाद भी चालू हुआ तथा काफी हल्ला भी हुआ। जीतेन्द्र,अतुल तथा स्वामीजी में। वह भी मजेदार कहानी है।कहानियां तमाम हैं। सिलसिलेवार लिखना काफी मजेदार हो सकता है-हिंदी ब्लागजगत के यादगार विवाद।
जब हमने लिखना शुरु किया था तब ३० के लगभग ब्लाग थे ।अब आंकड़ा लगभग ९० तक आ गया है। जल्द ही मामला तीन अंकों तक पहुंचेगा।
साथी ब्लागर कुछ तो बहुत अच्छा लिखते हैं। मैंने कुछ लेख संकलित करने शुरु किये थे-'हाल आफ फेम टाईप'के।कामआधा ही हो पाया लिहाजा उसे अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा।पहले कमेंट काफी अनौपचारिक तथा बिंदास किस्म के करते थे लोग।अब कुछ सभ्यता की बीमारी लग गई है। इधर कमेंट करने में कंजूसी भी काफी होने लगी है। मुझे लगता है कि यादगार टिप्पणियों का संग्रह भी किया जाना चाहिये।
मैं १ अप्रैल से नियमित रूप से हिंदिनी पर लिखने लगा। यहां कभी-कभी लिखता हूं। हिंदिनी पर शुरुआत भी मजेदार रही। स्वामीजी ने मेरा दिसम्बर में लेख पढ़ा था । फिर वे हिंदी मे ब्लाग लिखने लगे। सनसनीखेज भाषा के मालिक स्वामी शुरु में बराबर यह अवसर उपलब्ध कराते रहे कि लोग समझें कि ये हिंदी सीख रहा है। बाद में कुछ हमपर ज्यादा ही फिदा हो गये ये। एक दिन फोन पर करीब तीन घंटे बातचीत हुई । फिर हम इनके कहने पर हिंदिनी में लिखने लगे। पर मेरा लगाव यहां से बराबर बना हुआ है। जब निर्जीव तथा तकनीकी रूप से कमतर चीजों से लगाव इतना हैतो सजीव लोगों से लगाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि जब मैंने हिंदिनी में लिखना शुरु किया तब जीतेन्द्र-अतुल-स्वामी का प्रेमालाप चरम पर था। जीतेन्द्र ने कभी मुझसे कहा होगा अपनी साइट में लिखने को। मुझे नहीं याद रहा होगा। पर इनको याद था। तो काफी दिन मुंह फुलाये रहे जीतू। कहते थे -तुम तो अजातशत्रु हो। लेकिन तुम भीष्मपितामह की तरह जिस तरफ नहीं जाना चाहिये वहां चले गये। हम भी मौज लेते रहे।
फिलहाल लिखना जारी है। नेट पर, जहां कि लोग कुछ पोस्ट लिखकर ब्लाग बंदकर देते हैं तथा कुछ अंक निकाल कर पत्रिकायें वहां मुझे लगता है कि मैं लिखता रहा साल भर ,काफी है।हां ,भी कभी मन करता है कि मैं भीरविरतलामीजी तथा सुनीलजी की तरह नियमित लिख पाता!
मेरे लेखों के बारे में लोग बतायेंगे। मैं लंबे लेख लिखने के लिये बदनाम रहा ।पर कुछ अपने कुछ लेख बार-बार पढ़ने का मन करता है। तमाम दूसरे लेख भी हैं जिन्हें देखकर कोफ्त भी होती है। कथाकार कृष्णबिहारीजी अक्सर हौसला बढ़ाते हुयेकहते हैं-तुमको तो मुख्यधारा में आकर लिखना चाहिये। पूर्णमा वर्मनजी कहती हैं कि मेरे एक लेख में दो-तीन लेखों की बात मिली होती है।थोड़ा मेहनत से और बेहतर लेख लिखा जा सकता हैं। नंदनजी कहते हैं -तुम लिखते रहो ।दिशा अपने आप तय होती जायेगी।
मैं हर लेख लिखने के बाद यही सोचता हूं कि ये वाला पोस्ट कर दो आगे देखा जायेगा।
आप क्या सोचते हैं?
Wednesday, July 20, 2005
एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर
सबेरे जब हम आफिस पहुंचे तो मेज पर काम बहुत था। लिहाजा हम राउन्ड पर निकल गये। लौटा तो बताया गया कि जीतेन्द्र चौधरी का फोन आया था। हमने तमाम गैरजरूरी काम भी निपटा
लिये तब फोन करने की हिम्मत जुटा पाये।जो हमेशा सिर्फ एक मेल की दूरी पर रहता है वह चन्द मील दूर था। घंटी गयी तो जीतेन्द्र बजे। हाल-चाल का दर्द बांटा गया।हमने कहा-देख लो भइये,तुम्हारा लिखा साइट तक नहीं झेल पायी। शटर गिरा है मेरा पन्ना का। और लिखो-ब्राम्हण कहता है सालअच्छा है। जब हिंदी न जानने वाले इतना त्रस्त हो गये कि साइट जब्त कर ली तब हिंदी भाषियों का क्या हाल होगा!इसीलिये कहा गया है-अतिसर्वत्र वर्जयेत।पर जीतेन्द्र अविचिलित थे। बोले -सालों को वापस जाकर देखूंगा। मैंने पूंछा भी कि सालों को वहां देखोगे तो यहां किसको देखोगे? क्या वहां और सालों का जुगाड़ करोगे? कार्यक्रम पूछने पर बताया गया कि तमाम जगह जाना है। गोविंदनगर, रतनलालनगर, रामबाग वगैरह। बताने के अन्दाज से लग रहा था कि जैसे कोई बस स्टैंड वाला बसों के आवागमन की घोषणा कर कर रहा हो ।
बहरहाल जीतेन्द्र के तमाम बेतरतीब कार्यक्रमों ने हमें बचा लिया उनसे मुलाकात से। बोले शायद कल मिलेंगे। हमें लगा- चलो आज तो बचे। फिर भी एहतियातन हमने अपने पीए को बता दिया कि अगर हमारी अनुपस्थिति में जीतेन्द्र आयें तो जब तक हम आयें तबतक उनसे निरंतर का उनके हिस्से का अनुवाद का काम करा लें। जीतेन्द्र की तरफ से कम से एक दिन के लिये हम निश्चिन्त हो गये।
शाम को चार बजे फोन की घंटी बजी। सुरीली आवाज बोली-अनूपजी,नमस्ते। हमने कहा-नमस्ते क्या हाल हैं? पूछा गया-आपने पहचान लिया। हम सोच में डूबते-उतराते हुये बोले-पहचानने के नजदीक पहुंच रहा था कि इस सवाल से क्रमभंग हो गया।
क्षणिक सस्पेन्स का पटाक्षेप करते हुये बताया गया-मैं सारिका सक्सेना बोल रहीं हूं। नये सिरे से नमस्कार-खुशी का आदान -प्रदान हुआ। पता चला -रात की गाड़ी से वो कोलकता जा रहे हैं। तय हुआ शाम को स्टेशन में मिला जाये। घरों में तो लोग करते ही रहते हैं ब्लागर मीट। एक मुलाकात स्टेशन पर हो जाये।
हमने जीतेन्द्र को फिर खोजा। अटके थे गोविंदनगर में। पूछा चलोगे ब्लागर मीट को ऐतिहासिक बनाने। उनकी आवाज का भूगोल बिगड़ा हुआ था। बोले -यार ,इतना थका हूं कुछ पूछो मत। हम भी बोले -तुम बताओ मत हम समझ गये।
बहरहाल शाम को घर से जब मैं चला स्टेशन की ओर तो रात के आठ बज चुके थे। शब्दांजलि तथा अनकही बातें की सारिका से मिलने की उत्सुकता थी। कुछ देर भी हो गयी थी निकलने में। आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
तो पीसीओ की शरण में जाना तय किया गया। पता चला कि आज गाड़ी प्लेटफार्म एक की जगह छह पर आनी थी । वहीं वे लोग मौजूद थे। हम पहुंचे । मुलाकात हुयी। सारिका अपने पति वेंकट,भाई सुधांशु तथा बिटिया कांति के साथ प्लेटफार्म नं छह पर मौजूद थी। बिटिया हमें देखते ही निद्रागति को प्राप्त हुयी। तमाम जरूरी-गैरजरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान से वार्ता-चक्र शुरु हुआ।
वेंकट आई.आई.टी.मुम्बई से मेकेनिकल इंजीनियर स्नातक हैं । फिलहाल डेट्रायट,अमेरिका में है। बिना दान-दहेज के शादी किया यह जोड़ा हमें अनायास बहुत प्यारालगा। वेंकट हमें कोकाकोला पिलाने लगे। सारिका से भी ब्लागिंग के बारे में बाते होने लगीं। बताया कि पहले मैं बहुत बोर होती थी जब वेंकट अपने काम में जुटे रहते थे कम्प्यूटर पर। फिर इनके प्रोत्साहन से बेव डिजाइनिंग सीखना शुरु किया तथा ब्लागिंग और फिर शब्दांजलि पत्रिका शुरु की। अब तो हाल यह है कि समय कहाँ सरक जाता है ,पता ही नहीं लगता।
मैंने वेंकट से पूछा -तुम तेलगू ब्लाग के बारे में हमें रिपोर्टिंग किया करो भाई। तो पता चला कि तेलगू बस काम भर की ही जानते हैं वे। उतने से काम बनेगा नहीं। सारिका के ब्लाग पढ़ते हैं कि नहीं के जवाब में बताया गया-पढ़ता हूं पर गति धीमी रहती है।
सारिका ने फिर कुछ ब्लागर्स की तारीफ शुरु की। अतुल की सबसे ज्यादा तारीफ कर रहीं थी कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। इसके अलावा प्रत्यक्षा , रविरतलामी तथा निरंतर की टीम से प्रभावित थीं। ईस्वामी के बारे में पूछा-ये स्वामीजी कौन हैं। हमने बताया-यह तो शायद स्वामीजी भी नहीं जानते होंगे पर लिख-पढ़ - बोल लेते हैं उससे लगता है कि मानव योनि में अवतार लिया है।
निरंतर की बात चली तो फिर मजबूरन देवाशीष ,पंकज,रमणकौल,रविरतलामी तथा जीतेन्द्रकी नये सिरे से तारीफ करनी पड़ी। जल्दी-जल्दी सबका नाम जाप किया गया। पर मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
पर हम कोकाकोला का घूंट पी कर रह गये। प्रत्यक्षा की जब ज्यादा ही तारीफ की सारिका ने तो मैंने बहाने से बुराई करनी चाही कि प्रत्यक्षा की कहानियों का खास पैटर्न है कि लगभग हर कहानी में औरत दुखी है । वह अपना संक्षिप्त सुख का समय बिता करे लंबे दुख वियोग के पाले में आ जाती है । उसका चरित्र उदात्त भले ही दिखाया जाये पर मिलता दुख ही है। मेरी कोशिश सफल नहीं हुई क्योंकि सारिका कहने लगी कि पर उनकी कहानियों में पुरुष का पक्ष भी रखा गया है। फिर झेलना तो नारी को ही ज्यादा पड़ता है। हमने आगे कुछ नहीं कहा-चुपचाप दूसरों की सारी तारीफ झेल गये।
एक दूसरे की रचना-प्रकियाओं पर भी बात हुयी। पहले मैं भी कागज में लिखता था लेकिन धीरे-धीरे मामला पेपरलेस होता
गया। शुरुआत दोनों लोगों ने ही अभिव्यक्ति में रविरतलामी का लेख पढ़कर की। मतलब यह कि अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।
मैंने कहा कि तुम्हारी कुछ कविताओं की जिन लाईनों की मैं तारीफ करना चाहता था दूसरे लोग पहले ही उनकी तारीफ कर चुके हैं। थे । इसलिये नहीं की तारीफ। सारिका ने कहा तो कुछ नहीं इस पर लेकिन लगा कि कहना चाहती थीं कि ज़रा जल्दी विचार बनाकर तारीफ किया करें।मुझे बताया गया कि मेरा दीवारों का प्रेमालाप बहुत पसंद किया लोगों ने । तो मैंने बताया - निहायत चलताऊ अन्दाज में शुरु किया गया वह लेख बस यूं ही लिख गया था। अनूप भार्गव की कविताओं से लंबाई मिल गयी। बहरहाल मेरा यह विचार भी बना कि ज्यादा सोच-विचार के लिखने से लेख अच्छा हो जायेगा यह भ्रम रखना फिजूल है। इस बात पर साथी लोग विचार करें खासकर इंद्र अवस्थी जो अभी तक बचपने में ही अटके हैं।
बातें और तमाम सारी हुईं । सारिका -वेंकट परिणय के बारे में भी जानकारी मिली। दोनों के गुरुजी ने एक-दूसरे के अनुरुप देखकर इनकी शादी कराई। बिना किसी ताम-झाम दान-दहेज के।
विभिन्न रुचि-स्वभाव रखने के बावजूद खुशहाल मियां-बीबी को देखकर लगा कि देश को ऐसे आदर्श गुरुओं की जरूरत हैं जो ताम-झाम,दान-दहेज के बिना शादी कराकर समाज को नयी गति दें।बातचीत में कबसमय सरक गया पता ही नहीं चला।राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। सामान लेकर हम पास के ही केबिन में लपके। हालांकि कुली था फिर भी हमने सबसे हल्का झोलापकड़लिया।
डिब्बे के पास सारिका के भाई ने कहा-लाइये मैं पकड़ लेता हूं। मैंने कहा अब क्या यार,गाड़ी तक ही पहुंचा देता हूं। सारिका बोली -आप लिखेंगे कि सारिका ने मुझसे झोला उठवाया। मैंने कहा -नहीं ऐसा कुछ नहीं । यह सब भी कोई लिखने की बातें हैं? इसीलिये इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया।
ट्रेन चल दी। हम कानपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर हुयी ब्लागर मीट की तमाम यादें सहेजे लौटे। जो याद रहीं वे यहां लिख दीं। रास्ते भर हमें अगले दिन जीतेन्द्र से संभावित मुलाकात का 'पिलान' बनाते रहे।
लिये तब फोन करने की हिम्मत जुटा पाये।जो हमेशा सिर्फ एक मेल की दूरी पर रहता है वह चन्द मील दूर था। घंटी गयी तो जीतेन्द्र बजे। हाल-चाल का दर्द बांटा गया।हमने कहा-देख लो भइये,तुम्हारा लिखा साइट तक नहीं झेल पायी। शटर गिरा है मेरा पन्ना का। और लिखो-ब्राम्हण कहता है सालअच्छा है। जब हिंदी न जानने वाले इतना त्रस्त हो गये कि साइट जब्त कर ली तब हिंदी भाषियों का क्या हाल होगा!इसीलिये कहा गया है-अतिसर्वत्र वर्जयेत।पर जीतेन्द्र अविचिलित थे। बोले -सालों को वापस जाकर देखूंगा। मैंने पूंछा भी कि सालों को वहां देखोगे तो यहां किसको देखोगे? क्या वहां और सालों का जुगाड़ करोगे? कार्यक्रम पूछने पर बताया गया कि तमाम जगह जाना है। गोविंदनगर, रतनलालनगर, रामबाग वगैरह। बताने के अन्दाज से लग रहा था कि जैसे कोई बस स्टैंड वाला बसों के आवागमन की घोषणा कर कर रहा हो ।
बहरहाल जीतेन्द्र के तमाम बेतरतीब कार्यक्रमों ने हमें बचा लिया उनसे मुलाकात से। बोले शायद कल मिलेंगे। हमें लगा- चलो आज तो बचे। फिर भी एहतियातन हमने अपने पीए को बता दिया कि अगर हमारी अनुपस्थिति में जीतेन्द्र आयें तो जब तक हम आयें तबतक उनसे निरंतर का उनके हिस्से का अनुवाद का काम करा लें। जीतेन्द्र की तरफ से कम से एक दिन के लिये हम निश्चिन्त हो गये।
शाम को चार बजे फोन की घंटी बजी। सुरीली आवाज बोली-अनूपजी,नमस्ते। हमने कहा-नमस्ते क्या हाल हैं? पूछा गया-आपने पहचान लिया। हम सोच में डूबते-उतराते हुये बोले-पहचानने के नजदीक पहुंच रहा था कि इस सवाल से क्रमभंग हो गया।
क्षणिक सस्पेन्स का पटाक्षेप करते हुये बताया गया-मैं सारिका सक्सेना बोल रहीं हूं। नये सिरे से नमस्कार-खुशी का आदान -प्रदान हुआ। पता चला -रात की गाड़ी से वो कोलकता जा रहे हैं। तय हुआ शाम को स्टेशन में मिला जाये। घरों में तो लोग करते ही रहते हैं ब्लागर मीट। एक मुलाकात स्टेशन पर हो जाये।
हमने जीतेन्द्र को फिर खोजा। अटके थे गोविंदनगर में। पूछा चलोगे ब्लागर मीट को ऐतिहासिक बनाने। उनकी आवाज का भूगोल बिगड़ा हुआ था। बोले -यार ,इतना थका हूं कुछ पूछो मत। हम भी बोले -तुम बताओ मत हम समझ गये।
बहरहाल शाम को घर से जब मैं चला स्टेशन की ओर तो रात के आठ बज चुके थे। शब्दांजलि तथा अनकही बातें की सारिका से मिलने की उत्सुकता थी। कुछ देर भी हो गयी थी निकलने में। आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
स्टेशन पहुंचकर हमने प्लेटफार्म नंबर एक पर गोरे ,गोल-मटोल चेहरे की तलाश में अपनी गरदन तथा आंखों को लगा दिया। दस मिनट बाद दोनों सर्च इंजन मुंह लटकाके बोले-सारी ,जो बताया आपने वो हम नहीं खोज पाये। मैंनेसोचा -मौका अच्छा है। सारी खूबसूरत महिलाओं से पूछ लिया जाये-माफ कीजियेगा आप सारिका सक्सेना तो नहीं हैं जो अमेरिका से आयी हैं। फिर हमें लगा कि वे तो माफ कर देंगी पर हम कैसे माफ करेंगे अपने को? राजधानी एक्सप्रेस छूटने में मात्र एक घंटा बचा था। तो पीसीओ की शरण में जाना तय किया गया। पता चला कि आज गाड़ी प्लेटफार्म एक की जगह छह पर आनी थी । वहीं वे लोग मौजूद थे। हम पहुंचे । मुलाकात हुयी। सारिका अपने पति वेंकट,भाई सुधांशु तथा बिटिया कांति के साथ प्लेटफार्म नं छह पर मौजूद थी। बिटिया हमें देखते ही निद्रागति को प्राप्त हुयी। तमाम जरूरी-गैरजरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान से वार्ता-चक्र शुरु हुआ।
वेंकट आई.आई.टी.मुम्बई से मेकेनिकल इंजीनियर स्नातक हैं । फिलहाल डेट्रायट,अमेरिका में है। बिना दान-दहेज के शादी किया यह जोड़ा हमें अनायास बहुत प्यारालगा। वेंकट हमें कोकाकोला पिलाने लगे। सारिका से भी ब्लागिंग के बारे में बाते होने लगीं। बताया कि पहले मैं बहुत बोर होती थी जब वेंकट अपने काम में जुटे रहते थे कम्प्यूटर पर। फिर इनके प्रोत्साहन से बेव डिजाइनिंग सीखना शुरु किया तथा ब्लागिंग और फिर शब्दांजलि पत्रिका शुरु की। अब तो हाल यह है कि समय कहाँ सरक जाता है ,पता ही नहीं लगता।
मैंने वेंकट से पूछा -तुम तेलगू ब्लाग के बारे में हमें रिपोर्टिंग किया करो भाई। तो पता चला कि तेलगू बस काम भर की ही जानते हैं वे। उतने से काम बनेगा नहीं। सारिका के ब्लाग पढ़ते हैं कि नहीं के जवाब में बताया गया-पढ़ता हूं पर गति धीमी रहती है।
सारिका ने फिर कुछ ब्लागर्स की तारीफ शुरु की। अतुल की सबसे ज्यादा तारीफ कर रहीं थी कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। इसके अलावा प्रत्यक्षा , रविरतलामी तथा निरंतर की टीम से प्रभावित थीं। ईस्वामी के बारे में पूछा-ये स्वामीजी कौन हैं। हमने बताया-यह तो शायद स्वामीजी भी नहीं जानते होंगे पर लिख-पढ़ - बोल लेते हैं उससे लगता है कि मानव योनि में अवतार लिया है।
निरंतर की बात चली तो फिर मजबूरन देवाशीष ,पंकज,रमणकौल,रविरतलामी तथा जीतेन्द्रकी नये सिरे से तारीफ करनी पड़ी। जल्दी-जल्दी सबका नाम जाप किया गया। पर मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
तथा भैंस के दर्द पर शोधरत हैं।पर हम कोकाकोला का घूंट पी कर रह गये। प्रत्यक्षा की जब ज्यादा ही तारीफ की सारिका ने तो मैंने बहाने से बुराई करनी चाही कि प्रत्यक्षा की कहानियों का खास पैटर्न है कि लगभग हर कहानी में औरत दुखी है । वह अपना संक्षिप्त सुख का समय बिता करे लंबे दुख वियोग के पाले में आ जाती है । उसका चरित्र उदात्त भले ही दिखाया जाये पर मिलता दुख ही है। मेरी कोशिश सफल नहीं हुई क्योंकि सारिका कहने लगी कि पर उनकी कहानियों में पुरुष का पक्ष भी रखा गया है। फिर झेलना तो नारी को ही ज्यादा पड़ता है। हमने आगे कुछ नहीं कहा-चुपचाप दूसरों की सारी तारीफ झेल गये।
एक दूसरे की रचना-प्रकियाओं पर भी बात हुयी। पहले मैं भी कागज में लिखता था लेकिन धीरे-धीरे मामला पेपरलेस होता
गया। शुरुआत दोनों लोगों ने ही अभिव्यक्ति में रविरतलामी का लेख पढ़कर की। मतलब यह कि अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।
मैंने कहा कि तुम्हारी कुछ कविताओं की जिन लाईनों की मैं तारीफ करना चाहता था दूसरे लोग पहले ही उनकी तारीफ कर चुके हैं। थे । इसलिये नहीं की तारीफ। सारिका ने कहा तो कुछ नहीं इस पर लेकिन लगा कि कहना चाहती थीं कि ज़रा जल्दी विचार बनाकर तारीफ किया करें।मुझे बताया गया कि मेरा दीवारों का प्रेमालाप बहुत पसंद किया लोगों ने । तो मैंने बताया - निहायत चलताऊ अन्दाज में शुरु किया गया वह लेख बस यूं ही लिख गया था। अनूप भार्गव की कविताओं से लंबाई मिल गयी। बहरहाल मेरा यह विचार भी बना कि ज्यादा सोच-विचार के लिखने से लेख अच्छा हो जायेगा यह भ्रम रखना फिजूल है। इस बात पर साथी लोग विचार करें खासकर इंद्र अवस्थी जो अभी तक बचपने में ही अटके हैं।
अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।
बातें और तमाम सारी हुईं । सारिका -वेंकट परिणय के बारे में भी जानकारी मिली। दोनों के गुरुजी ने एक-दूसरे के अनुरुप देखकर इनकी शादी कराई। बिना किसी ताम-झाम दान-दहेज के।
विभिन्न रुचि-स्वभाव रखने के बावजूद खुशहाल मियां-बीबी को देखकर लगा कि देश को ऐसे आदर्श गुरुओं की जरूरत हैं जो ताम-झाम,दान-दहेज के बिना शादी कराकर समाज को नयी गति दें।बातचीत में कबसमय सरक गया पता ही नहीं चला।राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। सामान लेकर हम पास के ही केबिन में लपके। हालांकि कुली था फिर भी हमने सबसे हल्का झोलापकड़लिया।
डिब्बे के पास सारिका के भाई ने कहा-लाइये मैं पकड़ लेता हूं। मैंने कहा अब क्या यार,गाड़ी तक ही पहुंचा देता हूं। सारिका बोली -आप लिखेंगे कि सारिका ने मुझसे झोला उठवाया। मैंने कहा -नहीं ऐसा कुछ नहीं । यह सब भी कोई लिखने की बातें हैं? इसीलिये इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया।
ट्रेन चल दी। हम कानपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर हुयी ब्लागर मीट की तमाम यादें सहेजे लौटे। जो याद रहीं वे यहां लिख दीं। रास्ते भर हमें अगले दिन जीतेन्द्र से संभावित मुलाकात का 'पिलान' बनाते रहे।





