सात महीने पहले लक्षद्वीप में स्कूबा डाइविंग करते हुए तय किया था -'स्वीमिंग सीखना है।' घर से आशियाना आते-जाते स्वीमिंग पूल के पास से गुज़रते समय ख़ुद से किया यह वायदा याद आता। मंगलवार को स्वीमिंग पूल देखने गए। पता चला साप्ताहिक बंदी रहती है मंगल को। वहाँ के कैफ़े में चाय पीकर लौट आए।
कल फिर गए स्वीमिंग पूल के बारे में पता करने। घर के पास के मोड़ पर एक आदमी लहराते हुए मोटरसाइकिल चलाता दिखा। लहराते हुए मोटरसाइक़िल चलाते हुए आदमी मुस्करा रहा था। महिला मोटरसाइकिल के लहराने से पीछे बैठी महिला का संतुलन गड़बड़ा रहा था। वह अपने हाथ इधर-उधर करते हुए संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। खिलखिलाते हुए। संतुलन बनाने के बाद बाइक सवार का कंधा थाम लिया। मोटरसाइकिल का लहराना बंद हो गया। महिला का संतुलन बन गया। चालक की मुस्कान बंद हो गई। महिला की खिलखिलाहट भी चौड़ी मुस्कान में तब्दील हो गई।
जिस समय बाइक पर बैठी महिला खिलखिलाते हुए अपने हाथ उठाकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी उस समय उसके हाथ की हथेली में रची मेंहदी दिख रही थी। एक झलक भर दिखी हमें। उस झलक के साथ ही मुझे किशन सरोज जी के गीत का मुखड़ा याद आ गया :
जन्म-जन्मों ताल-सा हिलता रहा मन।
वह मोटरसाइकिल सवार मोड़ से आगे चला गया। अपन भी आगे बढ़ गए। स्वीमिंग पूल के पास दिहाड़ी मजदूरों की लाइन लगी थी। काम की तलाश में। पुरुष और महिला दोनों से उनमें। अपने पास आते हर इंसान को वे अपने लिए रोजगार की संभावना के रूप में देखते। उस इंसान के आगे बढ़ जाने पर वे फिर किसी दूसरे इंसान का इन्तज़ार करने लगते जिससे उनकी दिहाड़ी का इंतज़ाम हो सके। हम अपनी गाड़ी स्विमिंग पूल के बाहर खड़ी करके अंदर चले गए।
स्वीमिंग पूल में लोग अपनी तैराकी करके वापस जा रहे थे। रेट पता किए। 3500/- रुपए महीना लगेंगे स्वीमिंग के। और जानकारी लेकर हम वाहर आ गए । वहीं बने कैफे में चाय पी। फिर वापस लौट लिए।
बाहर आकर फिर दिहाड़ी मजदूर दिखे । उनकी तरफ़ गए तो उनमें से अधिकतर मेरी तरफ़ आशा भरी नजरों से देखने लगे। एकाध ने पास आकर पूछा भी -'लेबर चाहिए? '
हमारे ' नहीं ' कहते हुए उनकी रुचि हममें ख़त्म हो गई। हम वहीं खड़े होकर उनमें से एक से बतियाने लगे। उसके साथ खड़े लोग हमारी बातचीत को बेमन से सुनते रहे।
उन श्रमिकों में राजगीर का काम करने वालों के औजार उनकी साइकिल पर टंगे थे। तीन -चार लोग होंगे राजगीर। वे अपनी साइकिलों के पास खड़े थे। कुछ लोग बैठे भी थे। एक आदमी उकड़ू बैठा जमीन पर सीधे, चित्त लेटे मोबाइल में कोई रील जैसी चीज देख रहा था। मोबाइल देखते हुए अपनी उँगली से रील आगे सरकाता जा रहा था। उसे देखकर लगा मानो वह मोबाइल में पेट पर रील स्क्रॉल करने के बहाने अपनी उँगली दायें से बायें फिरा रहा था। इससे मोबाइल के पेट में भी गुदगुदी मच रही होगी। लेकिन शायद उसको भी मजा आ रहा होगा। तभी वह बिना किसी एतराज के रील-रील पर दिखाता जा रहा था। शायद मन ही मन मुस्करा भी रहा हो।
लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि ज्यादातर लोग मजदूरी के लिए आए हैं। 300 से 400 रुपए दिहाड़ी के मिलते हैं। राजगीर की दिहाड़ी हज़ार-बारह सौ रुपये हैं। आजकल गर्मी के चलते काम कम मिलता है। बमुश्किल महीने में दस -बारह दिन। सब
भगवान भरोसे है।
लखनऊ में सरकारी नियमानुसार अकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 433 रुपए प्रतिदिन है। लेकिन इसको लागू करवाना सरकार की क्षमता के बाहर है। समाज सरकार से ज़्यादा प्रभावकारी है।
सुबह के दस बज चुके थे। हमने पूछा अब भी मजदूरी मिलने की आशा है? उसने कहा -'हाँ, आजकल लोग देरी से उठते हैं। कभी-कभी देर से आते हैं। क्या पता मिल ही जाये मजदूरी। मजदूरी न मिलने पर कम दाम पर भी लोग चले जाते हैं। दिन बेकार करने से अच्छा कुछ मिल जाये। भूखे रहने से अच्छा कम पैसे में काम कर लेना। हमको अंसार कंबरी की गीत पंक्ति याद आ गई :
हम भी बाज़ार में आ गये ‘क़म्बरी’
अपनी क़ीमत को अब और कम क्या करें
हम उन लोगों को वहीं अपनी दिहाड़ी के इंतज़ार में छोड़कर घर वापस आ गए।








